10 जून को इतिहास रचेंगे पीएम मोदी! टूट जाएगा नेहरू का 62 साल पुराना महा-रिकॉर्ड, भारतीय राजनीति में दर्ज होगा नया अध्याय​​​

देश के राजनीतिक इतिहास में कई बड़े रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब एक और महा-रिकॉर्ड बनाने के बेहद करीब पहुंच चुके हैं। आगामी 10 जून को पीएम मोदी लगातार सबसे लंबे कार्यकाल वाले देश के पहले प्रधानमंत्री बन जाएंगे। उन्होंने 26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। 10 जून को उनके कार्यकाल के कुल 4399 दिन पूरे हो जाएंगे। इसके साथ ही वह देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार 4398 दिनों के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को पीछे छोड़ देंगे।

क्या था पंडित नेहरू का पुराना रिकॉर्ड?

देश के लोकतांत्रिक इतिहास में आजादी के बाद हुए पहले आम चुनाव के बाद 17 अप्रैल, 1952 को पहली लोकसभा का गठन हुआ था। इसके बाद नवगठित लोकसभा की पहली बैठक 13 मई, 1952 को आयोजित की गई थी। इसी दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी और उन्होंने 27 मई, 1964 तक लगातार देश की सेवा की। 13 मई, 1952 से लेकर 27 मई, 1964 तक का यह समय कुल 4,398 दिनों का बैठता है, जो अब तक का सबसे लंबा निरंतर कार्यकाल था।

इंदिरा गांधी का रिकॉर्ड बहुत पहले छूटा

साल 2014 में देश की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी का कार्यकाल 26 मई, 2014 से शुरू हुआ था, जो 10 जून, 2026 को 4,399 दिनों का महा-रिकॉर्ड छू लेगा। अगर देश के अन्य प्रधानमंत्रियों के निरंतर कार्यकाल की बात करें, तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का लगातार कार्यकाल 24 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1977 तक था, जो कुल 4077 दिन का होता है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंदिरा गांधी के इस रिकॉर्ड को पिछले साल 25 जुलाई, 2025 को ही पार कर लिया था।

चुनौतियों और परिस्थियों के बीच बड़ा अंतर

पंडित नेहरू और पीएम मोदी ने देश का नेतृत्व बिल्कुल अलग-अलग दौर और परिस्थितियों में किया है। जब नेहरू देश के प्रधानमंत्री बने थे, तब भारत की कुल जनसंख्या लगभग 34 करोड़ थी। वहीं, साल 2014 में जब पीएम मोदी ने सत्ता संभाली, तब तक देश की आबादी 131 करोड़ से ज्यादा हो चुकी थी, जो शासन की जटिलता के मामले में करीब चार गुना अधिक थी। आज के समय में भारत की आबादी 146 करोड़ के पार पहुंच चुकी है।

जनसंख्या के साथ-साथ चुनावी राजनीति का स्वरूप भी पूरी तरह बदल चुका है। साल 1951-52 के पहले आम चुनाव में महज 53 राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था, जबकि 2014 तक यह संख्या बढ़कर 464 हो गई। चुनावी विखंडन की यह रफ्तार 2024 के चुनावों में ऐतिहासिक शिखर पर पहुंच गई, जहां कुल 7445 राजनीतिक दलों ने भागीदारी की। नेहरू के दौर के मुकाबले आज क्षेत्रीय दलों की ताकत और चुनौतियां काफी बढ़ चुकी हैं।

इसके अलावा, पहले आम चुनाव में करीब 17 करोड़ मतदाता थे, जो 2014 तक 83 करोड़ से ज्यादा हो गए। इसी तेजी से देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है। इन तमाम बड़ी चुनौतियों के बावजूद पीएम मोदी लगातार दो बार पूर्ण बहुमत के साथ कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने। साथ ही, वह नेहरू के बाद लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री भी हैं।

सामाजिक न्याय और मंत्रिपरिषद का बदलता स्वरूप

इन दोनों प्रधानमंत्रियों के इतने लंबे दौर के कामकाज की तुलना सामाजिक न्याय के पैमाने पर भी की जा रही है। सरकारी सूत्रों से मिले आंकड़ों के अनुसार, पंडित नेहरू के तीसरे कार्यकाल (1957-1962) के दौरान केंद्रीय मंत्रिपरिषद में पिछड़े और वंचित समूहों का प्रतिनिधित्व बेहद कम था। उस समय अनुसूचित जाति से सिर्फ तीन या चार सदस्य ही शामिल थे, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का प्रतिनिधित्व शून्य के बराबर था।

इसके विपरीत, वर्तमान मोदी मंत्रिपरिषद के लगभग 60 फीसदी सदस्य पिछड़े, दलित और आदिवासी समाज से ताल्लुक रखते हैं। मौजूदा कैबिनेट में ओबीसी वर्ग से 27, अनुसूचित जाति से 10 और अनुसूचित जनजाति से पांच सदस्य शामिल हैं। वहीं, महिला सशक्तिकरण की बात करें तो साल 1952 में महिला कैबिनेट सांसदों की भागीदारी केवल 4.4 प्रतिशत (22 सांसद) थी, जो साल 2024 में बढ़कर 13.63 प्रतिशत (74 सांसद) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।

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