बैंकों ने कंजूसी दिखाई? RBI के रेट कट के बावजूद नहीं कम हुईं Loan EMI

बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के दौरान भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की गई ब्याज दर में कटौती का फायदा उधार लेने वालों को सिर्फ आंशिक रूप से ही मिला. उधार देने की दरें तो कम हुईं, लेकिन उतनी नहीं जितनी पॉलिसी दर में कटौती की गई थी. रिपोर्ट में बताया गया है कि RBI ने फरवरी 2025 से रेपो दर को 6.50 फीसदी से घटाकर 5.25 फीसदी कर दिया, जो कि 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती थी. इसका उद्देश्य उधार लेने की कॉस्ट को कम करना और निजी निवेश को बढ़ावा देना था.

बैंकों ने कंजूसी दिखाई? RBI के रेट कट के बावजूद नहीं कम हुईं Loan EMI

हालांकि, इस दर कटौती का वास्तविक उधार दरों में असर पूरे बैंकिंग सिस्टम में एक जैसा नहीं रहा. रिर्पोर्ट में कहा गया है कि साल के दौरान उधार लेने की कॉस्ट में कमी तो आई, लेकिन उतनी नहीं जितनी रेपो दर में 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती हुई थी. रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि बैंकों ने संतुलन बनाए रखने के लिए डिपॉजिट रेट्स में भी कटौती की, जिसका असर मार्जिनल कॉस्ट ऑफ़ फंड्सबेस्ड लेंडिंग रेट जैसे उधार बेंचमार्क पर पड़ा.

सिर्फ 0.93 फीसदी की हुई कटौती

रिपोर्ट के अनुसार, नए कर्जों पर वेटेड एवरेज लेंडिंग रेट्स में 93 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई, जो दर कटौती के आंशिक असर को दिखाता है. वहीं, औसत MCLR में 45 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई, जिससे पता चलता है कि बेंचमार्क उधार दरें ज्यादा ही धीमी गति से एडजस्ट की गई हैं. रेट कट का असर अलगअलग तरह के बैंकों में अलगअलग रहा. विदेशी बैंकों में उधार दरों में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई, उसके बाद प्राइवेट सेक्टर के बैंकों और फिर सरकारी बैंकों का नंबर आया.

यह अंतर उन कर्जों के हिस्से से जुड़ा था जो बाहरी बेंचमार्क से जुड़े थे. रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि बाहरी बेंचमार्क उधार दरों से जुड़े कर्जों का ज्यादा हिस्सा होने से, खासकर रिटेल और एमएसएमई सेक्टर्स में, रेट कट का असर ज्यादा तेजी से हुआ. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। विदेशी बैंकों के लगभग 94 फीसदी कर्ज EBLR से जुड़े थे, उसके बाद प्राइवेट बैंकों के 89 प्रतिशत कर्ज EBLR से जुड़े थे, जबकि सरकारी बैंकों के लगभग 51 प्रतिशत कर्ज EBLR से जुड़े थे.

सभी सेक्टर में अलग अलग दिखा असर

सेक्टोरल वाइज देखें तो, रेट कट का असर काफी अलगअलग रहा. सबसे ज्यादा लेंडिंग रेट्स बिना किसी गारंटी वाले रिटेल कर्जें में देखी गईं, जो 10.1 प्रतिशत थीं, उसके बाद एग्री लोन का नंबर आया, जो 9.81 प्रतिशत थीं. इसके विपरीत, सबसे कम दर रुपए में दिए जाने वाले एक्सपोर्ट लोन के लिए थी, जो 6.78 प्रतिशत थी.

रिटेल लोन में, हाउसिंग लोन की दरें 7.63 प्रतिशत के साथ अपेक्षाकृत कम थीं, जबकि वाहन और शिक्षा लोन की दरें 9 प्रतिशत से ऊपर थीं. रेट कट का असर एक्सपोर्ट क्रेडिट और एजुकेशन लोन जैसे सेगमेंट में सबसे ज्यादा देखने को मिला, जहां उधार देने की दरें 160 बेसिस पॉइंट से ज़्यादा कम हो गईं. MSME लोन और बिना किसी गारंटी वाले रिटेल लोन में भी काफी गिरावट देखी गई, जो रेपो रेट में कटौती के लगभग बराबर थी. इसके विपरीत, कृषि, प्रोफेशनल सर्विसेज और बड़े उद्योगों जैसे क्षेत्रों में बहुत कम कटौती हुई.

19 हजार करोड़ की सेविंग

रिपोर्ट का अनुमान है कि उधार लेने वालों को कम ब्याज लागत से फायदा हुआ, जिससे प्रमुख क्षेत्रों में कुल मिलाकर लगभग 19,000 करोड़ रुपए की बचत हुई. इस कटौती से हाउसिंग और MSME लोन को सबसे ज़्यादा फ़ायदा हुआ. ब्याज दर चक्र के स्थिर होने के करीब पहुंचने के साथ, निकट भविष्य में उधार देने की दरों में केवल मामूली बदलाव की उम्मीद है, जब तक कि नीति की दिशा पर और स्पष्टता न आ जाए.

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