Gold: तमिलनाडु हो या केरल, दक्षिण के राज्यों में लोग इतना सोना क्यों खरीदते हैं?​

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से अपील की है कि वे अगले एक साल तक सोना न खरीदें. देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के इरादे से पीएम ने यह अपील की है. उनकी अपील के बाद सोने से जुड़ा बाजार निराश हो गया. शेयर बाजार पर भी इसका नकारात्मक असर देखा जा रहा है. पीएम की अपील पर आम जन क्या प्रतिक्रिया देंगे, यह आने वाला समय बताएगा. लोग यह मानकर चल रहे हैं कि सोना सुरक्षा देता है. बचत की आदत बनती है. बेटेबेटियों की शादियों में भी अमीरगरीब अपनी क्षमता के अनुरूप सोने के गहने खरीदते ही हैं. उत्तर और मध्य भारत के मुकाबले दक्षिण भारतीय राज्यों में यह कुछ ज्यादा ही देखा जाता है.

Gold: तमिलनाडु हो या केरल, दक्षिण के राज्यों में लोग इतना सोना क्यों खरीदते हैं?​

पीएम की इस अपील के बहाने आइए जानते हैं कि आखिर दक्षिण भारतीय राज्य ज्यादा सोना क्यों खरीदते हैं? दक्षिण भारत में सोना सिर्फ गहना नहीं है. यह परंपरा भी है. यह बचत भी है. सम्मान का प्रतीक भी है. कई परिवारों के लिए यह आपातकाल की पूंजी भी है. तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में सोने की मांग लंबे समय से बहुत अधिक रही है. रिपोर्ट्स पर भरोसा करें तो दक्षिण भारत में देश के घरेलू सोने का लगभग 40 फीसदी हिस्सा मौजूद है.

सबसे बड़ा कारण है परंपरा और संस्कृति

दक्षिण भारत में सोना धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक जीवन का हिस्सा है. शादी हो, नामकरण हो, त्योहार हो या कोई शुभ अवसर, सोना अक्सर खरीदा या दिया जाता है. बहुत से परिवार सोने को शुभ मानते हैं. अक्षय तृतीया, धनतेरस, विवाह और मंदिरों से जुड़े अवसरों पर सोना खरीदना अच्छी शुरुआत माना जाता है. इस वजह से मांग केवल बाजार की नहीं होती, भावनात्मक भी होती है. यही कारण है कि सोने की खरीद एक आदत बन जाती है. एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को यही परंपरा देती है.

केरल में एक दुल्हन आमतौर पर 320 ग्राम सोना धारण करती है.

शादीब्याह में सोने की बड़ी भूमिका

दक्षिण भारत की शादियों में सोने का महत्व बहुत अधिक है. कई समुदायों में विवाह के समय सोना दुल्हन की सुरक्षा, सम्मान और पारिवारिक स्थिति से जोड़ा जाता है. सोना केवल सजावट नहीं माना जाता. उसे भविष्य की संपत्ति भी माना जाता है.

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की एक रिपोर्ट कहती है कि केरल में एक दुल्हन आमतौर पर 320 ग्राम सोना धारण करती है. तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में यही आंकड़ा 300 ग्राम है. भारत में हर साल करीब 800 से 900 टन सोने की खपत होती है. रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत में रोज लगभग 2 से 2.5 टन सोने की खरीद होती है. इस खरीद में दक्षिण भारतीय राज्यों की बड़ी भागीदारी है.

सोने की खरीद में दक्षिण भारतीय राज्यों की बड़ी भागीदारी है.

सोना है सबसे भरोसेमंद बचत

दक्षिण भारत के बहुत से परिवार सोने को चलतीफिरती बचत मानते हैं. बैंक जमा, शेयर या म्यूचुअल फंड सबको समझ में नहीं आते, लेकिन सोना सभी को समझ आता है. सोना हाथ में दिखता है. घर में रखा जा सकता है. जरूरत पर बेचा जा सकता है या उसके बदले गोल्ड लोन लिया जा सकता है. एक रिपोर्ट कहती है कि भारतीय परिवारों के पास करीब 25 हजार टन सोना होने का अनुमान है. दक्षिण भारत के परिवारों के पास देश के औसत से अधिक सोना पाया जाता है. इसका मतलब साफ है. दक्षिण भारत में सोना केवल पहनने की चीज नहीं है. यह परिवार की बैकअप पूंजी है.

महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा से भी जुड़ा है सोना

भारत में महिलाओं के पास बहुत बड़ी मात्रा में सोना है. कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि भारतीय महिलाओं के पास दुनिया के कुल सोने का करीब 11 फीसदी हिस्सा है. दक्षिण भारत में यह सोच और मजबूत है कि सोना महिला की व्यक्तिगत सुरक्षा है. मुश्किल समय में यही सबसे पहले काम आता है, इसलिए परिवार धीरेधीरे सोना जोड़ते रहते हैं. इस सामाजिक सोच ने भी मांग को लगातार ऊंचा रखा हुआ है.

चेन्नई, कोच्चि, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोयंबटूर जैसे शहर सोने के बड़े केंद्र हैं.

बहुत मजबूत है दक्षिण भारत में ज्वेलरी बाजार

जहां बड़ा बाजार होता है, वहां खरीद भी ज्यादा होती है. चेन्नई, कोच्चि, बेंगलुरु, हैदराबाद और कोयंबटूर जैसे शहर सोने के बड़े केंद्र हैं. यहां पारंपरिक ज्वेलर्स भी हैं. देश के सभी बड़े ब्रांड भी हैं. डिजाइन की बहुत विविधता भी मिलती है. तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में मजबूत सप्लाई चेन, ज्वेलरी कारोबार और अधिक प्रतिस्पर्धा के कारण ग्राहकों को ज्यादा विकल्प मिलते हैं. कई रिपोर्ट यह भी बताती है कि बंदरगाहों के पास होने से कई जगहों पर परिवहन लागत कम पड़ती है. जब बाजार संगठित हो, विकल्प अधिक हों और खरीद आसान हो, तब मांग बढ़ती ही है.

कीमत में थोड़ा अंतर भी खरीद को बढ़ाता है

हर राज्य में सोने की अंतिम कीमत एक जैसी नहीं होती. इस पर कई बातें असर डालती हैं. स्थानीय मांग, सप्लाई, लॉजिस्टिक्स, टैक्स, मेकिंग चार्ज और बाजार की प्रतिस्पर्धा आदि. बंदरगाहों के पास वाले शहरों में ट्रांसपोर्ट खर्च कम हो सकता है. इससे कुछ जगहों पर सोने की कुल लागत थोड़ी कम पड़ती है. दक्षिण भारत के कई शहरों में ज्वेलरी बाजार इतना सक्रिय है कि ग्राहक रोज रेट तुलना करते हैं. यह आदत भी खरीद को मजबूत करती है.

भारत के लिए सोने के आयात के सबसे बड़े स्रोत स्विट्जरलैंड, करीब 40 फीसदी, फिर यूएई 16 फीसदी से अधिक है.

सोने की मांग के पीछे राष्ट्रीय आर्थिक ढांचा भी

भारत अपनी जरूरत का अधिकतर सोना आयात करता है. इसका मतलब है कि देश के भीतर मांग बहुत ऊंची है. रिपोर्ट के अनुसार भारत का सोना आयात 202526 में 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के लिए सोने के आयात के सबसे बड़े स्रोत स्विट्जरलैंड, करीब 40 फीसदी, फिर यूएई 16 फीसदी से अधिक और दक्षिण अफ्रीका का योगदान लगभग 10 फीसदी है. यह आंकड़े दिखाते हैं कि भारत में सोने की भूख कितनी बड़ी है, और उस मांग में दक्षिण भारत की हिस्सेदारी काफी मजबूत मानी जाती है.

प्रतिष्ठा और पहचान भी है दक्षिण भारत में सोना

बहुत से परिवारों में सोना सामाजिक पहचान से जुड़ा है. त्योहारों, पारिवारिक समारोहों और विवाहों में सोने का प्रदर्शन भी एक सांस्कृतिक तत्व बन गया है. यह हर जगह समान नहीं है, पर दक्षिण भारत के कई हिस्सों में यह परंपरा स्पष्ट दिखती है. सोना यहां दिखावे से अधिक सम्मान और सुरक्षा का मिश्रण है. इसी कारण लोग सोना बेचने से बचते हैं. वे उसे संभालकर रखते हैं और मौका मिलने पर फिर खरीदते हैं.

इस तरह कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत में सोने की अधिक खरीद का कारण केवल अमीरी नहीं है. इसके पीछे संस्कृति है. शादी की परंपरा है. महिलाओं की सुरक्षा की सोच है. बचत की आदत है. मजबूत ज्वेलरी बाजार है और पीढ़ियों से बनी मानसिकता है कि सोना कभी बेकार नहीं जाता. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। यही वजह है कि दक्षिण के राज्यों में सोना आज भी सबसे पसंदीदा संपत्तियों में गिना जाता है.

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