नई दिल्ली। पश्चिम एशिया संकट को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता पर अनिश्चितताओं का असर भारत पर भी पड़ता दिखने लगा है। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के असर को आम भारतीयों की जेब पर पड़ने से ज्यादा दिनों तक नहीं टाला जा सकता।

गुरुवार को अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 126.41 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं जो पिछले चार में सबसे अधिक है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। घरेलू मुद्रा बाजार में डॉलर के मुकाबले रुपया भी 95 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया।
इससे वित्त मंत्रालय से लेकर आरबीआई तक के अधिकारियों के माथे पर दोहरी चिंता की रेखाएं गहरी हो गई हैं। वैसे बाजार बंद होने के समय रुपया 94.84 के स्तर पर था, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि रुपया 95 के ऊपर अब असामान्य नहीं कहा जाएगा।
इन घटनाक्रमों के बीच यह भी तय है कि सरकारी तेल कंपनियों के लिए अब पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतों को मौजूदा स्तर पर रखना संभव नहीं होगा। उम्मीद यही है कि पूर्व की तरह इस बार भी देश में पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतें थोड़ीथोड़ी करके बढ़ाई जाएंगी।
गुरुवार को बाजार खुलने के समय से ही भारतीय रुपया 95 के स्तर पर रहा और एक समय वह 95.34 के स्तर पर चला गया था। इसके पहले रुपये ने 95 के स्तर को 30 मार्च, 2026 को पार किया था।
आरबीआई की कोशिश है कि रुपया 95 के स्तर से नीचे रहे। यही वजह है कि गुरुवार को भी केंद्रीय बैंक ने मुद्रा बाजार में तेजी से हस्तक्षेप किया, जिसकी वजह से रुपये को फिर से 95 के स्तर से नीचे लाया जा सका।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के वीके विजय कुमार ने इसके लिए तीन कारण गिनाए। पहला, ब्रेंट क्रूड का 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचना जिससे भारत का व्यापार घाटा व चालू खाते का घाटा और बढ़ने का डर है।
दूसरा, भारतीय बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों का लगातार बाहर निकलना। तीसरा, अमेरिका में 10 वर्ष वाली प्रतिभूतियों पर ब्याज की दर बढ़कर 4.4 प्रतिशत पर पहुंचना, इससे भारतीय शेयर बाजार से एफआईआई की निकासी बढ़ने की संभावना है।
कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का कारण कम आपूर्ति
कच्चे तेल की कीमतें 126 डालर तक पहुंचने के पीछे प्रमुख कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने को बताया जा रहा है। पश्चिम एशिया युद्ध में शामिल तीनों पक्षों की तरफ से युद्धविराम तोड़ने की कोशिश नहीं हुई है, लेकिन होर्मुज से कच्चे तेल की आपूर्ति की समस्या जस की तस बनी हुई है।
भारत के कई टैंकर भी इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और अपनी 85 प्रतिशत जरूरतें आयात से पूरी करता है।
126 डॉलर प्रति बैरल का स्तर आयात बिल को भारी भरकम बना देगा, जिससे चालू खाते का घाटा बढ़ेगा और पूंजीगत खाते में बेलगाम घाटे का खतरा पैदा हो गया है। युद्ध की शुरुआत में क्रूड की कीमत 72 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब दोगुनी हो चुकी हैं।
एक डॉलर की वृद्धि से 8,000 करोड़ बढ़ता है आयात बिल
तेल कंपनियों की मोटे तौर पर गणना है कि कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की वृद्धि भारत के तेल आयात बिल को 8,000 करोड़ रुपये बढ़ा देती है। पेट्रोलियम मंत्रालय का आंकड़ा बताता है कि वर्ष 202526 में भारत का तेल आयात बिल 121.8 अरब डॉलर था, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 11 प्रतिशत कम था।
वर्ष 202526 के दौरान भारत ने कच्चे तेल के लिए औसतन 70.99 डॉलर प्रति बैरल का भुगतान किया था। जबकि अप्रैल, 2026 में भारत की औसत खरीद कीमत 114.25 डालर रही है।
साफ है कि अगर कच्चे तेल की कीमत इसी स्तर पर रहती है तो भारत का आयात बिल बहुत अधिक रहेगा। इसका मतलब है कि तेल कंपनियों की तरफ से डालर की मांग बढ़ेगी और इसका असर रुपये की कीमत पर भी होगा।
बढ़ सकती है महंगाई
महंगा कच्चा तेल और कमजोर रुपया भारत में महंगाई बढ़ा सकते हैं। महंगाई की सबसे पहली मार पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में वृद्धि से पड़ने वाली है।
पिछले दिनों पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया था कि तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 24 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 35 रुपये प्रति लीटर की अंडर रिकवरी रही है।
अभी भी तकरीबन यही स्थिति है। माना जाता है कि चार बड़े राज्यों में चुनावों के मद्देनजर तेल कंपनियों ने पेट्रोल एवं डीजल की खुदरा कीमतें नहीं बढ़ाई थीं। अब वे इस बारे में फैसला कर सकती हैं।





