इधर ट्रंप-जिनपिंग की तस्वीर आई, उधर मोदी से मिलने पहुंचे ईरान-रूस के विदेश मंत्री​

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिल रहे हैं। जिनपिंग से हाथ मिलाने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने जो बयान दिया वो भारत के लिए एक बड़े तूफान की चेतावनी हो सकता है। लेकिन जिस वक्त डोनाल्ड ट्रंप शी जिनपिंग के साथ टहल रहे थे उसी वक्त रूस के विदेश मंत्री सरगई लवरोव भारत पहुंच गए और बयान दे दिया कि हिंदी रूसी भाईभाई। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। दिल्ली का पारा सिर्फ मौसम की वजह से नहीं बल्कि हाई प्रोफाइल रणनीति की वजह से चढ़ा हुआ है। दुनिया की नजरें इस वक्त नई दिल्ली पर टिकी है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने खड़े थे रूस के विदेश मंत्री सरगई लावरोव और ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराची। लेकिन सवाल यह है कि आखिर युद्ध और वैश्विक तनाव के इस दौर में यह दिग्गज अचानक भारत क्यों खींचे चले आए? दरअसल ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक दिल्ली में शुरू हो चुकी है और माहौल अब और गमा गया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इन मंत्रियों से मिलने पहुंचे। रूस, ईरान, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के विदेश मंत्रियों के साथ पीएम मोदी की यह मुलाकात सिर्फ शिष्टाचार नहीं थी। जब ब्रिक्स फैमिली फोटो के लिए सब एक साथ खड़े हुए तो संदेश साफ था भारत ग्लोबल साउथ की वो आवाज है जिसे कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता है। सोचिए एक तरफ रूस यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। दूसरी तरफ ईरान और इजराइल के बीच तनाव चरम पर है।

इधर ट्रंप-जिनपिंग की तस्वीर आई, उधर मोदी से मिलने पहुंचे ईरान-रूस के विदेश मंत्री​
अमेरिका और पश्चिम के प्रतिबंधों का सामना कर रहे यह दोनों देश भारत में आकर पीएम मोदी से मिल रहे हैं। जो दिखाता है कि नई दिल्ली आज के दौर में ग्लोबल पीसमेकर की भूमिका में है। ईरान के विदेश मंत्री का भारत आना यह संकेत देता है कि ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार के लिए भारत उनकी प्राथमिकता है। चाहे पश्चिम का दबाव कितना भी हो। बैठक के पहले दिन विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपनी बात ट्रेडमार्क शैली में रखी। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया भू राजनीतिक उथलपुथल और व्यापारिक व्यवधानों से गुजर रही है। जयशंकर ने ब्रिक्स देशों से आग्रह किया कि वे अब व्यावहारिक तरीके खोजें। उनका इशारा साफ था। सिर्फ बातों से काम नहीं चलने वाला है बल्कि युद्ध और संघर्ष के बीच व्यापार को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

जयशंकर ने शांति के लिए संवाद और कूटनीति के महत्व पर जोर देकर फिर से भारत का स्टैंड साफ कर दिया। अब यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब रेड सी और पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। ईरान और इजराइल के बीच संभावित टकराव से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं। भारत ने इसी मन से दुनिया को आगाह किया कि आर्थिक अनिश्चितताएं और जलवायु चुनौतियां अब हमारे दरवाजे पर आ चुकी हैं। ब्रिक्स को यहां एक स्टेबलाइज फोर्स यानी स्थिरता लाने वाली शक्ति बनना होगा। दरअसल, यह 11 उभरती अर्थव्यवस्थाओं का वह समूह है जो दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। दुनिया की 40% जीडीपी और 26% वैश्विक व्यापार यहीं से आता है। जब भारत इस समूह की अध्यक्षता करता है तो वह सिर्फ अपना हित नहीं बल्कि पूरी विकासशील दुनिया का नेतृत्व कर रहा होता है।

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