रेलवे का मास्टरस्ट्रोक! अब 100% स्वदेशी एल्युमिनियम से बनेंगी नई वंदे भारत ट्रेनें, होगी करोड़ों की बचत​

भारतीय रेल भविष्य के सफर को हाईटेक और सुपरफास्ट बनाने के लिए एक ऐसे क्रांतिकारी मिशन पर काम कर रही है, जो इतिहास में गेम चेंजर साबित होने वाला है। वंदे भारत 3.0 मिशन के तहत रेल मंत्रालय ने भविष्य की सभी वंदे भारत स्लीपर और हाईस्पीड वर्जन के पूरे ढांचे को 100 फीसदी स्वदेशी एल्युमिनियम बॉडी से बनाने की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।

रेलवे का मास्टरस्ट्रोक! अब 100% स्वदेशी एल्युमिनियम से बनेंगी नई वंदे भारत ट्रेनें, होगी करोड़ों की बचत​

रेलवे के इस मास्टरस्ट्रोक से ट्रेनों की बॉडी और विशेष कंपोनेंट्स के लिए यूरोप या अन्य विकसित देशों पर भारत की निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी। आइए जानते हैं कि रेलवे का यह स्वदेशी फॉर्मूला पटरियों पर रफ्तार का क्या नया गणित लिखने वाला है।

40% कम होगा वजन

वर्तमान समय में देश के ट्रैक पर दौड़ रही सभी वंदे भारत ट्रेनें स्टेनलेस स्टील से बनी हैं। तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, स्टेनलेस स्टील के मुकाबले स्वदेशी एल्युमिनियम का इस्तेमाल करने से ट्रेन का कुल वजन 30 से 40 फीसदी तक कम हो जाएगा। वजन कम होने का सीधा असर ट्रेन के पिकअप और रफ्तार पर पड़ेगा। एल्युमिनियम बॉडी वाली यह नई वंदे भारत महज कुछ ही सेकेंड्स में 160 से 180 किलोमीटर प्रति घंटे की टॉप स्पीड पकड़ने में सक्षम होगी। इसके अलावा, हल्की बॉडी होने के कारण बिजली की खपत बहुत कम होगी, जिससे भारतीय रेलवे को हर साल करोड़ों रुपये के राजस्व की भारीभरकम बचत होगी।

मैन्युफैक्चरिंग लागत में 15% तक की बड़ी गिरावट

रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि अब तक विदेशी वेंडर्स से एल्युमिनियम के विशेष ग्रेड आयात करने पड़ते थे, जिससे ट्रेनों को बनाने की लागत बहुत अधिक आ रही थी। लेकिन अब देश के भीतर ही लोकल’ वेल्डिंग, डिजाइनिंग और असेंबलिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। मेक इन इंडिया के तहत घरेलू स्तर पर काम होने से एक ट्रेन सेट की कुल मैन्युफैक्चरिंग लागत में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट आने का अनुमान है, जिसका सीधा फायदा भविष्य में यात्रियों को सस्ते किराए के रूप में मिल सकता है।

तटीय इलाकों के लिए जीवनदायिनी बनेगी यह तकनीक

मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और ओडिशा जैसे तटीय इलाकों में चलने वाली ट्रेनों के लिए यह तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है। समुद्र की नम हवाओं के कारण स्टील की ट्रेनों में बहुत जल्द जंग लगने का खतरा रहता है। चूंकि एल्युमिनियम में जंग नहीं लगती, इसलिए तटीय पटरियों पर भी ये ट्रेनें 35 से 40 सालों तक पूरी तरह सुरक्षित और चमकदार बनी रहेंगी।

सुरक्षा के लिए इनबिल्ट मिलेगा कवच 4.0

रफ्तार के साथसाथ रेलवे ने सुरक्षा के मानकों को भी सबसे ऊपर रखा है। वंदे भारत 3.0 की इन सभी नई ट्रेनों में देश का सबसे अत्याधुनिक सुरक्षा कवच कवच 4.0 इनबिल्ट होगा। यह सिस्टम कोहरे या किसी मानवीय चूक की स्थिति में ऑटोमैटिक ब्रेक लगाने की क्षमता रखता है। इसके साथ ही, ट्रेन के एल्युमिनियम शेल को क्रैशवर्दीनेस के कड़े यूरोपीय मानकों के तहत डिजाइन किया जा रहा है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना में यात्रियों को खरोंच तक न आए।

अगस्त 2027 तक परीक्षण और 400 ट्रेनों का बड़ा लक्ष्य

रेलवे ने इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए टाइमलाइन भी तय कर दी है। अगस्त 2027 तक स्वदेशी बुलेट ट्रेन के लिए इस एल्युमिनियम तकनीक का परीक्षण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, अगले 5 वर्षों के विजन में भारतीय रेलवे का इरादा कम से कम 400 वंदे भारत ट्रेनों को इसी चमचमाती और हल्की एल्युमिनियम बॉडी के साथ ट्रैक पर उतारने का है, जो आत्मनिर्भर भारत की एक नई और बुलंद तस्वीर पेश करेगा।

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