जर्मनी में क्षेत्रीय चुनावी गतिविधियां चल रही हैं. पूर्वी राज्य सैक्सोनीऑनहाल्ट में हुए चुनाव में दक्षिण पंथी पार्टी आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी ने बड़ी जीत हासिल की है. पार्टी को करीब 44 फीसदी वोट मिले हैं लेकिन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत नहीं मिला है. सरकार बनाने के लिए 83 सीटों वाले सदन के लिए 42 सीटों का जीतना जरूरी है. उम्मीद है कि आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी को 39 सीटों पर विजय मिल सकती है. जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन को सिर्फ 18 फीसदी वोट मिले हैं. माना जा रहा है कि इससे राष्ट्रीय सरकार पर भी असर पड़ सकता है. देखना रोचक होगा कि इस चुनाव के अंतिम नतीजों के आने तक जर्मनी की राष्ट्रीय राजनीति क्या रुख अख्तियार करती है? आइए, जर्मनी में चुनावी हलचल के बीच जानते हैं कि चुनाव राज्य के हों या राष्ट्रीय, जर्मनी के चुनाव भारत से कितने अलग हैं?

जर्मनी और भारत दोनों लोकतांत्रिक देश हैं. दोनों देशों में जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है. दोनों जगह चुनाव नियमित रूप से होते हैं. फिर भी दोनों की चुनाव व्यवस्था में बड़ा अंतर है. भारत में चुनाव व्यवस्था मुख्य रूप से ब्रिटिश मॉडल पर आधारित है. जर्मनी में चुनाव व्यवस्था आनुपातिक प्रतिनिधित्व और गठबंधन राजनीति पर आधारित है. भारत में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिल सकता है. जर्मनी में अक्सर कई दल मिलकर सरकार बनाते हैं. दोनों देशों में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव होते हैं. भारत में क्षेत्रीय चुनावों को विधानसभा चुनाव कहा जाता है. जर्मनी में राज्यों को लैंडर कहा जाता है. वहां होने वाले चुनावों को लैंडटाग चुनाव कहा जाता है.
जर्मनी में राष्ट्रीय चुनाव की क्या है व्यवस्था?
जर्मनी में राष्ट्रीय स्तर पर बुंडेस्टाग के चुनाव होते हैं. बुंडेस्टाग वहां की संसद का निचला सदन है. जर्मनी का मतदाता दो वोट डालता है. पहला वोट किसी स्थानीय उम्मीदवार के लिए होता है. इसे प्रत्यक्ष उम्मीदवार का वोट कहा जा सकता है. इस वोट से स्थानीय क्षेत्र का प्रतिनिधि चुना जाता है. दूसरा वोट किसी राजनीतिक दल की सूची के लिए होता है. यह वोट बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इससे संसद में दलों की कुल सीटों का अनुपात तय होता है. जर्मनी की व्यवस्था में पार्टी को मिले वोटों के आधार पर सीटें बांटी जाती हैं. इसका उद्देश्य यह है कि संसद में दलों को उनके मत प्रतिशत के करीब प्रतिनिधित्व मिले. किसी दल को सामान्य तौर पर संसद में प्रवेश करने के लिए कम से कम पांच प्रतिशत वोट प्राप्त करने होते हैं. कुछ विशेष परिस्थितियों में सीधे जीती गई सीटें भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. इस प्रणाली के कारण जर्मनी में संसद में कई दल पहुंचते हैं. किसी एक दल को बहुमत मिलना कठिन होता है. इसलिए सरकार बनाने के लिए दलों को आपस में समझौता करना पड़ता है.
भारत में राष्ट्रीय चुनाव कैसे होते हैं?
भारत में राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा चुनाव होते हैं. लोकसभा संसद का निचला सदन है. इसके सदस्य जनता सीधे चुनती है. देश को अलगअलग लोकसभा क्षेत्रों में बांटा गया है. हर क्षेत्र से एक उम्मीदवार जीतता है. जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वोट मिलते हैं, वह विजेता बनता है. इसे फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली कहा जाता है. इस व्यवस्था में उम्मीदवार को कुल वोटों का 50 प्रतिशत पाना जरूरी नहीं होता.
यदि किसी क्षेत्र में पांच उम्मीदवार हैं, तो 30 प्रतिशत वोट पाने वाला उम्मीदवार भी जीत सकता है. बाकी उम्मीदवारों को मिले वोट सीटों में नहीं बदलते. लोकसभा में बहुमत पाने वाला दल या गठबंधन केंद्र में सरकार बनाता है. प्रधानमंत्री आमतौर पर बहुमत वाले दल या गठबंधन का नेता होता है. भारत में लोकसभा का कार्यकाल सामान्य रूप से पांच वर्ष होता है. विशेष परिस्थितियों में यह अवधि बढ़ाई जा सकती है. लोकसभा को समय से पहले भंग भी किया जा सकता है.
जर्मनी में कैसे होते हैं राज्य चुनाव?
जर्मनी में 16 संघीय राज्य हैं. हर राज्य की अपनी संसद होती है. इसे लैंडटाग कहा जाता है. राज्य चुनावों में मतदाता आमतौर पर पार्टी और उम्मीदवार दोनों को महत्व देते हैं. कई राज्यों में मतदाता को एक से अधिक वोट देने का अधिकार होता है. लैंडटाग चुनावों में भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व का उपयोग किया जाता है. इससे छोटे दलों को भी संसद में स्थान मिल सकता है. राज्य सरकार का प्रमुख मंत्रीप्रेसिडेंट कहलाता है. इसका चुनाव राज्य की संसद करती है यानी जर्मनी में राज्य का प्रमुख भी जनता द्वारा सीधे नहीं चुना जाता. राज्य चुनावों का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है. यदि किसी दल का प्रदर्शन कई राज्यों में खराब रहता है, तो उसकी राष्ट्रीय छवि प्रभावित हो सकती है.
जर्मनी में 16 संघीय राज्य हैं और हर राज्य की अपनी संसद होती है.
कैसे होते हैं भारत में विधानसभा चुनाव?
भारत में राज्यों की अपनी विधानसभाएं होती हैं. विधानसभा के सदस्य जनता सीधे चुनती है. यहां भी फर्स्ट पास्ट द पोस्ट प्रणाली लागू होती है. राज्य को विधानसभा क्षेत्रों में बांटा जाता है. हर क्षेत्र से एक उम्मीदवार जीतता है. सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार विधायक बनता है. विधानसभा में बहुमत पाने वाला दल राज्य सरकार बनाता है. उस दल का नेता मुख्यमंत्री बनता है. भारत के राज्यों में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बहुत मजबूत है. कई राज्यों में राष्ट्रीय दलों के साथ क्षेत्रीय दल भी सत्ता के प्रमुख दावेदार होते हैं. राज्यों के चुनाव आमतौर पर पांच वर्ष के अंतराल पर होते हैं. लेकिन विधानसभा समय से पहले भंग की जा सकती है. ऐसी स्थिति में फिर से चुनाव कराए जाते हैं.
दोनों देशों के राष्ट्रपति की भूमिकाएं औपचारिक
भारत में राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख होता है. राष्ट्रपति का चुनाव जनता सीधे नहीं करती. सांसद और विधायक मिलकर राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं. भारत का राष्ट्रपति सामान्य रूप से मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करता है. वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास होती है. जर्मनी में भी राष्ट्रपति का पद मुख्य रूप से औपचारिक है. वहां राष्ट्रपति का चुनाव एक विशेष संघीय सभा करती है. इसमें संसद के सदस्य और राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं. जर्मनी में वास्तविक राजनीतिक शक्ति चांसलर के पास होती है. चांसलर सरकार का नेतृत्व करता है. इस मामले में भारत के प्रधानमंत्री और जर्मनी के चांसलर की भूमिका काफी मिलतीजुलती है.
भारत में मतदान. फोटो: Pexels
भारत और जर्मनी के चुनाव प्रचार में कितना अंतर?
भारत में चुनाव प्रचार बहुत बड़े पैमाने पर होता है. रैलियां, रोड शो, पोस्टर और सोशल मीडिया इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दों की भूमिका भी बहुत बड़ी होती है. जर्मनी में चुनाव प्रचार अपेक्षाकृत संगठित और नीति आधारित होता है. वहां दल अपने घोषणापत्र और योजनाओं पर जोर देते हैं. ये समाचार आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे है। टेलीविजन बहस और सार्वजनिक संवाद भी महत्वपूर्ण होते हैं. भारत में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकती है. जर्मनी में भी पहचान से जुड़े मुद्दे मौजूद हैं. लेकिन वहां आर्थिक नीति, प्रवासन, ऊर्जा, सुरक्षा और यूरोपीय संघ जैसे मुद्दों पर अधिक चर्चा होती है. भारत में कई चरणों में चुनाव होते हैं जबकि जर्मनी में एक ही दिन में चुनाव की परंपरा चली आ रही है.
भारत में चुनाव आयोग और जर्मनी में कई संस्थाएं जिम्मेदार
भारत में चुनावों का संचालन भारत निर्वाचन आयोग करता है. यह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है. आयोग मतदाता सूची, मतदान की तारीख, चुनाव आचार संहिता और मतगणना की निगरानी करता है. जर्मनी में चुनाव संचालन की जिम्मेदारी अलगअलग प्रशासनिक संस्थाओं के पास होती है. संघीय स्तर पर संघीय रिटर्निंग अधिकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. राज्यों और स्थानीय निकायों की भी इसमें भागीदारी होती है. भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग होता है. जर्मनी में मतदान प्रक्रिया मुख्य रूप से कागजी मतपत्रों पर आधारित है. यह दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है.



