एयर इंडिया एक बार फिर बड़े बदलाव के मुहाने पर खड़ी है. टाटा ग्रुप के हाथों में जाने के बाद से ही इस एयरलाइन ने अपनी खोई हुई साख वापस पाने की लंबी कवायद शुरू की है. अब, जब मौजूदा चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर कैंपबेल विल्सन के इस्तीफे का ऐलान हो चुका है, तो कमान संभालने के लिए एक नए और मजबूत नेतृत्व की तलाश तेज हो गई है. बाजार में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि क्या टाटा किसी विदेशी दिग्गज पर भरोसा जताएगा या फिर एयरलाइन का नियंत्रण किसी भारतीय अधिकारी को सौंपा जाएगा. इस दौड़ में एयर इंडिया के चीफ कमर्शियल और ट्रांसफॉर्मेशन ऑफिसर निपुण अग्रवाल का नाम मजबूती से उभर कर सामने आ रहा है.

निपुण अग्रवाल का पलड़ा क्यों है भारी?
निपुण अग्रवाल टाटा समूह के लिए कोई नया नाम नहीं हैं. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। साल 2021 में जब टाटा ने एयर इंडिया को अपने पोर्टफोलियो में शामिल किया था, तब अग्रवाल ने उस अधिग्रहण प्रक्रिया में एक बेहद अहम भूमिका निभाई थी. इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के गहरे अनुभव वाले निपुण तभी से एयरलाइन के अहम फैसलों का हिस्सा रहे हैं. पिछले साल ही उन्हें लोकॉस्ट सब्सिडियरी एयर इंडिया एक्सप्रेस का चेयरमैन भी नियुक्त किया गया था.
नए विमानों और इंजनों की खरीद को लेकर हुई जटिल सौदेबाजी हो या फिर यूरोप और नॉर्थ अमेरिका के लिए उड़ानों का नया नेटवर्क तैयार करना, उन्होंने हर मोर्चे पर अपनी काबिलियत साबित की है. उनके काम का सीधा असर यात्रियों की सहूलियत पर दिखा है. दिल्ली हब में उड़ानों का एक ऐसा सटीक टाइमटेबल तैयार किया गया, जिससे यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जाने वाले यात्रियों को कनेक्टिंग फ्लाइट्स के लिए कम से कम इंतजार करना पड़े. हालांकि, सीईओ की इस रेस में वह अकेले नहीं हैं, उनके साथ दो विदेशी एयरलाइन अधिकारी भी शॉर्टलिस्ट किए गए हैं.
20 हजार करोड़ का घाटा
नए सीईओ के सिर पर जो ताज सजेगा, वह चुनौतियों से भरा होगा. एयरलाइन का अधिग्रहण किए हुए चार साल बीत चुके हैं, लेकिन टाटा ग्रुप के लिए वित्तीय चुनौतियां कम नहीं हुई हैं. वित्तीय वर्ष 2026 में एयर इंडिया को 20,000 करोड़ रुपये से अधिक के भारी भरकम घाटे का सामना करना पड़ रहा है. हालात इतने पेचीदा हैं कि कंपनी ने अगले पांच साल में मुनाफे में आने का जो शुरुआती लक्ष्य रखा था, उसे अब आगे खिसकाना पड़ा है.
इसके अलावा, पिछले साल अहमदाबाद में हुए दर्दनाक विमान हादसे ने सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए थे. इस हादसे में 260 से अधिक लोगों की जान चली गई थी, जिसके बाद से दुनिया भर के विमानन नियामक एयर इंडिया की कड़ी निगरानी कर रहे हैं. यात्रियों का भरोसा दोबारा जीतना और सुरक्षा मानकों को विश्वस्तरीय बनाना नए नेतृत्व की सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी.
लगातार बढ़ रहा है खर्च
घाटे के पीछे सिर्फ आंतरिक कारण नहीं हैं, बल्कि वैश्विक भूराजनीतिक हालात भी एयरलाइन के मुनाफे को खा रहे हैं. पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के कारण विमान ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं. वहीं, पाकिस्तानी हवाई क्षेत्र के बंद होने से एयर इंडिया की परेशानियां अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी इंडिगो के मुकाबले कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं.
यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली एयर इंडिया की उड़ानों को अब लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है. इसके चलते उत्तरी अमेरिका जाने वाली फ्लाइट्स को अब बीच रास्ते में वियना या स्टॉकहोम में रुकना पड़ता है. लंबा रूट होने से ईंधन की खपत और क्रू का खर्च अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है. यह बढ़ा हुआ खर्च सीधा एयरलाइन की बैलेंस शीट पर असर डाल रहा है और अगर हालात ऐसे ही रहे, तो इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव टिकट की कीमतों के रूप में आम आदमी की जेब पर भी पड़ सकता है.
टाटा संस का बोर्ड, जिसमें आठ सदस्य शामिल हैं , अब अंतिम फैसले के करीब है. विल्सन का कार्यकाल सितंबर तक है, लेकिन उत्तराधिकारी मिलते ही वे पद छोड़ देंगे.





