
“हम बिहार से हैं, क्या यह हमारा गुनाह है? मेरा बेटा तो सिर्फ खुशियां मनाने गया था, वह तो सबका सहारा था, फिर उसे इतनी बेरहमी से क्यों मार दिया गया?… यह विलाप उस अभागी मां मीना देवी का है, जिसका 21 वर्षीय बेटा पांडव अब इस दुनिया में नहीं है, दिल्ली के जाफरपुर कलां इलाके में रविवार की उस काली रात ने न केवल एक नौजवान की जान ली, बल्कि इंसानियत और खाकी के इकबाल पर भी गहरा घाव कर दिया.
शनिवार की शाम उत्तम नगर की कुमार कॉलोनी में रहने वाले पांडव कुमार के लिए बेहद खास थी. वह अपने दोस्त रूपेश कुमार के दो साल के मासूम बेटे के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने के लिए जाफरपुर कलां के रावता गांव गया था. घर से निकलते वक्त मां मीना देवी ने उसे विदा किया था, यह सोचकर कि बेटा खुशियां मनाकर लौटेगा और फिर अपने काम पर चला जाएगा.
एक न्यूज एजेंसी के मुताबिक, पार्टी में हंसी-ठिठोली हुई, केक कटा और करीब 10-12 दोस्त-रिश्तेदार इस छोटे से जश्न का हिस्सा बने. रात के करीब 2:30 बज रहे थे. गांव की गलियों में सन्नाटा था, लेकिन रूपेश के घर के बाहर मेहमान विदा हो रहे थे. कुछ लोग कार में बैठ चुके थे, तो कुछ अपनी स्कूटी और बाइक स्टार्ट कर रहे थे. पांडव भी अपने दोस्त कृष्ण के साथ मोटरसाइकिल पर सवार था, बस निकलने ही वाला था.
नफरत की दस्तक: जब रक्षक बना भक्षक
तभी अचानक सामने वाले घर की छत से एक शख्स नीचे उतरा. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। यह कोई आम आदमी नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में तैनात हेड कांस्टेबल नीरज बलहारा था. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नीरज के चेहरे पर गुस्सा था और जुबान पर कड़वाहट. उसने सड़क पर खड़े इन युवाओं से पूछताछ शुरू कर दी कि वे इतनी रात को यहां क्या कर रहे हैं. रूपेश ने बेहद विनम्रता से जवाब दिया- साहब, मेरे बेटे का जन्मदिन था, बस मेहमान जा ही रहे हैं. लेकिन खाकी के नशे और कथित तौर पर शराब के धुएं में धुत नीरज को यह नागवार गुजरा. उसने चिल्लाना शुरू कर दिया.
‘बिहारी हो, भागो यहाँ से…’ और गूंज उठी गोली
वहां मौजूद चश्मदीद रूपेश और दीपक बताते हैं कि नीरज का गुस्सा अचानक एक खास क्षेत्र के लोगों के प्रति नफरत में बदल गया. दरअसल, वहां लोग मैथिली भाषा में बात कर रहे थे. कांस्टेबल ने चीखते हुए कहा, “तुम बिहारी हो, चले जाओ यहां से…”. उसने गंदी गालियां दीं और क्षेत्रवाद का जहर उगलना शुरू कर दिया.
विवाद बढ़ा, तो नीरज ने आव देखा न ताव, अपनी जेब से सरकारी ‘ग्लोक’ पिस्टल निकाली. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उसने बाइक पर बैठे पांडव के सीने पर पिस्टल सटा दी. एक जोरदार धमाका हुआ और सन्नाटे को चीरती हुई गोली पांडव के सीने के आर-पार निकल गई. नफरत की वह गोली इतनी शक्तिशाली थी कि पांडव का सीना चीरते हुए वो पीछे बैठे उसके दोस्त कृष्ण के पेट में जा धंसी.
जै
मां का इंतजार और वो मनहूस कॉल
उधर उत्तम नगर में मीना देवी बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थीं कि उनका बेटा काम से कब लौटेगा. लेकिन सुबह के पहले उजाले के साथ जो खबर आई, उसने उनकी रूह कंपा दी. उन्हें बताया गया कि उनके लाडले को गोली मार दी गई है. अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि पांडव की मौत हो चुकी है.
अस्पताल के बाहर बिलखती मीना देवी बार-बार एक ही सवाल पूछ रही थीं, “वह हरियाणा से था, हम बिहार से हैं, तो इसमें गुस्सा होने वाली क्या बात थी? क्या बिहार के लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है?” पांडव घर का इकलौता कमाने वाला सदस्य था, जो कड़ी मेहनत कर अपने परिवार का पेट पाल रहा था.
पलायन, पसीना और फिर मौत
पांडव की मौत ने उन लाखों प्रवासियों के दर्द को हरा कर दिया है जो दो वक्त की रोटी के लिए दिल्ली जैसे शहरों में अपना पसीना बहाते हैं. परिजनों का आरोप है कि आरोपी पुलिसकर्मी इस बात से भी चिढ़ा हुआ था कि बिहार के लोग यहां आकर घर बना रहे हैं और तरक्की कर रहे हैं. एक मामूली सी बात, सड़क पर खड़ा होना महज इसलिए जानलेवा साबित हुई क्योंकि वे लोग अपनी मातृभाषा में बात कर रहे थे और एक अलग राज्य से ताल्लुक रखते थे.
कानूनी कार्रवाई और फरार आरोपी
वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी हेड कांस्टेबल नीरज मौके से फरार हो गया. पुलिस ने हत्या और हत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया है. प्रारंभिक जांच में पता चला है कि आरोपी नीरज पिछले 15 सालों से उस इलाके में अकेला रह रहा था. पुलिस की स्पेशल सेल ने ही अपने विभाग के इस दागी सिपाही को देर शाम रोहतक के पास से गिरफ्तार किया.
लेकिन मीना देवी के लिए गिरफ्तारी काफी नहीं है. वह न्याय मांग रही हैं. वह पूछ रही हैं कि जिस पुलिस पर लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, अगर उसका ही जवान सरेआम बिहारी कहकर गोलियां बरसाने लगे, तो गरीब आदमी कहां जाएगा?
एक परिवार की तबाही
पांडव के एक रिश्तेदार ने रूंधे गले से कहा, “उसे फांसी होनी चाहिए. उसने सिर्फ मेरे भाई को नहीं मारा, हमारे पूरे परिवार के भविष्य को मार दिया है. वह अपनी जिम्मेदारियां समझता था, दिन-रात काम करता था. क्या अब हम रात को काम पर भी नहीं निकल सकते?”
अस्पताल में घायल कृष्ण जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहा है, जबकि पांडव का शरीर पोस्टमार्टम हाउस में पड़ा है. एक मां अपने बेटे का चेहरा देखने के लिए रविवार से सोमवार का इंतजार कर रही है, और समाज उस नफरत भरी सोच पर सवाल उठा रहा है जिसने एक हंसते-खेलते नौजवान को क्षेत्रवाद की भेंट चढ़ा दिया.





