विक्रांत और राखी की जघन्य हत्या के मामले में मुख्य आरोपी और स्थानीय बीजेपी नेता सुधरस चौहान की गिरफ्तारी ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। पुलिस भले ही इसे अपनी पीठ थपथपाने वाली कामयाबी बता रही हो, लेकिन स्थानीय लोगों के दावों ने खाकी की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

दावों और हकीकत के बीच उलझी पुलिस
क्षेत्र में चर्चा है कि जिस आरोपी को पकड़ने के लिए पुलिस की कई टीमें अलगअलग राज्यों में छापेमारी का दावा कर रही थीं, वह कथित तौर पर काफी समय से अपने ही घर में मौजूद था। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि आरोपी की मौजूदगी सार्वजनिक होने के बावजूद पुलिस सक्रिय नहीं हुई। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह पुलिस की ‘खुफिया विफलता’ थी या फिर रसूखदार आरोपी को बचाने की कोई सोचीसमझी रणनीति?
शांतिपूर्ण सरेंडर या गिरफ्तारी?
गिरफ्तारी के दौरान किसी भी तरह की सख्ती या मुठभेड़ का न होना भी संदेह पैदा कर रहा है। विपक्ष और सामाजिक संगठन अब इसे ‘नियोजित सरेंडर’ करार दे रहे हैं। हालांकि, आधिकारिक बयान में पुलिस प्रशासन ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पुलिस का तर्क है कि गिरफ्तारी पूरी तरह से टेक्निकल सर्विलांस और सटीक खुफिया इनपुट के आधार पर की गई है।
पारदर्शिता पर उठती उंगलियां
डबल मर्डर के इस संवेदनशील मामले में अब जनता जवाबदेही मांग रही है। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। लोगों का कहना है कि अगर आरोपी घर में ही था, तो पुलिस की दबिश अब तक नाकाम क्यों रही? क्या सत्ता के दबाव में जांच की दिशा मोड़ने की कोशिश की गई? विक्रांत और राखी के परिवारों को न्याय दिलाने की इस लड़ाई में अब पुलिस की निष्पक्षता सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।





