बंगाल में वोटिंग परसेंट से ज्यादा सुखद है वोटरों के ‘सकुशल’ रहने का रिकॉर्ड

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी को भूलना मुश्किल हो रहा था. 2019 में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम का कहना था ‘पश्चिम बंगाल में चुनाव के वक्त हिंसा आम बात रही है… चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी रही हो.’

बंगाल में वोटिंग परसेंट से ज्यादा सुखद है वोटरों के ‘सकुशल’ रहने का रिकॉर्ड

15 मार्च को 2026 के विधानसभा चुनावों की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने आश्वस्त किया था, ‘पश्चिम बंगाल में चुनाव हिंसा मुक्त और शांतिपूर्ण होंगे.’

अब तो मानना पड़ेगा. मुख्य चुनाव आयुक्त ने महज कोरा दावा नहीं किया था, उसे साबित करके दिखाया भी है. पहले कई चरणों में वोटिंग इसीलिए कराई जाती थी, ताकि हिंसक घटनाओं को समय से रोका जा सके. मौजूदा चुनाव सिर्फ दो चरणों में हुआ. 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को और सबसे ज्यादा वोटिंग भी हुई है, 90 फीसदी से भी ज्यादा.

बरसों बाद ऐसा हुआ है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान कोई बड़ी हिंसक घटना नहीं हुई, और सबसे बड़ी बात एक भी मौत की खबर नहीं आई है क्रेडिट तो चुनाव आयोग को ही जाता है.

बंगाल में, हिंसामुक्त चुनाव होना!

पश्चिम बंगाल में चुनाव की घोषणा के बाद चुनाव आयोग के जिस आदेश पर सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया हुई, वह था राज्य के आला अफसरों के तबादले. एकएक करके चुनाव आयोग ने पूरा प्रशासनिक अमला बदल डाला. ऊपर से नीचे तक. मुख्य सचिव और डीजीपी ही नहीं, बहुत सारे थानेदारों को भी हटा दिया गया और भवानीपुर में तो वोटिंग के ठीक पहले भी थानेदारों को बदला गया.

पूरे चुनाव कैंपेन के दौरान ममता बनर्जी तबादलों को लेकर चुनाव आयोग पर हमलावर रहीं. तकरीबन हर रैली में, यह बताना नहीं भूलती थीं कि उनके हाथ में कोई पावर नहीं रह गया है. कई बार तो ऐसा भी जताया कि उनके राज्य की पुलिस भी उनकी नहीं सुन रही. हालांकि, यह भी कहा कि उनको अपना काम करने दीजिए.

जैसे राजनीति के तमाम जानकार और चुनाव विश्लेषकों के लिए यह चौंकाने वाला अनुभव रहा है, हैरान तो ममता बनर्जी भी हो रही होंगी. जिस बंगाल में चुनावी हिंसा को लाइलाज बीमारी माना जाने लगा, वहां हिंसा की कोई बड़ी घटना नहीं हुई. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। चुनाव आयोग के एहतियाती उपाय बेहद कारगर साबित हुए.

चुनाव विश्लेषकों और राजनीति वैज्ञानिकों के लिए यह एक चौंकाने वाला अनुभव रहा. दशकों बाद ऐसा हुआ है जब किसी बड़े चुनाव में हत्या, बमबारी या गंभीर चोट की कोई आधिकारिक रिपोर्ट सामने नहीं आई.

1. पश्चिम बंगाल में दो चरणों में हुए चुनाव को शांतिपूर्ण तरीके संपन्न कराने के लिए चुनाव आयोग ने केंद्रीय सुरक्षा बलों की 2400 कंपनियां तैनात की थी, जिसमें 2.4 लाख सुरक्षाकर्मी शामिल हैं. 2021 में 8 चरणों में चुनाव कराए गए थे, और तब केंद्रीय बलों की 1100 कंपनियां तैनात की गई थीं.

2. बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 के दौरान हुई हिंसा में 25 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 800 से अधिक लोग गंभीर रूप से जख्मी हुए थे. 2024 के आम चुनाव में भी हिंसा हुई थी, जिसमें 7 लोगों की मौत हुई थी, और करीब 700 लोग घायल हुए थे.

3. पश्चिम बंगाल में हिंसा की शुरुआत 70 के दशक में हुई थी. यह वह दौर था जब सीपीएम वहां उभर रही थी. ठीक वैसे ही 90 के दशक के अंतिम दौर में तृणमूल कांग्रेस भी उभरने लगी थी, और तब सीपीएम को चुनौती मिलने लगी थी. परिवर्तन के नारे के साथ ममता बनर्जी 2011 में बंगाल की सत्ता में आईं, लेकिन चुनावी हिंसा नहीं थमी.

4. जब बंगाल में तृणमूल और बीजेपी का अस्तित्व नहीं था, तब भी कांग्रेस और लेफ्ट के बीच खूब हिंसा होती थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने पश्चिम बंगाल विधानसभा में एक आंकड़ा पेश किया था जिसमें बताया गया कि 198889 के बीच राजनीतिक हिंसा में 86 राजनीतिक कार्यकर्ता मारे गए थे. हिंसा के शिकार कार्यकर्ताओं में 34 सीपीएम के थे और 19 कांग्रेस के. कांग्रेस की तरफ से उन दिनों राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपा गया था, जिसमें पश्चिम बंगाल में ये बताते हुए राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने की मांग की गई थी कि 1989 के शुरुआती 50 दिनों में ही कांग्रेस के 26 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, चुनाव के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिम बंगाल में ही होती रही है. चाहे वह पंचायत चुनाव हो, या फिर लोकसभा चुनाव. धीरे धीरे यह धारणा बनती जा रही थी कि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा राजनीतिक वर्चस्व के लिए शक्ति प्रदर्शन में तब्दील होती जा रही है. ये हिंसक घटनाएं चुनाव के पहले हों, या बाद में लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती ने ऐसी सारी ही धारणाओं को पूरी तरह बदल दिया है.

चुनाव 2026 बनाम चुनाव 2021

1. चुनाव आयोग की तरफ से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा 15 मार्च 2026 को की गई थी. और, तीन दिन बाद ही उत्तर 24 परगना में तृणमूल कांग्रेस के एक बूथ अध्यक्ष की पीट पीट कर हत्या कर दी गई. शायद चुनाव आयोग के लिए ये वेकअप कॉल थी, आगे बढ़ने से पहले अलर्ट होने के लिए.

2. स्वतंत्र संघर्ष निगरानी संस्था ACLED के आंकड़ों के अनुसार, 2021 का पश्चिम बंगाल चुनाव सबसे हिंसक रहा, जिसमें आचार संहिता लागू होने से लेकर नई सरकार के गठन तक हिंसा की कुल 278 घटनाएं दर्ज की गईं.

3. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 में 300 हिंसक घटनाएं हुई थीं, और उनमें 58 मौतें दर्ज की गईं.

4. बंगाल 2020 के बाद से हुए विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय चुनावों के दौरान दर्ज कुल चुनावी हिंसा की घटनाओं में से 35 फीसदी और कुल मौतों में से 51 फीसदी अकेले बंगाल में हुईं.

5. मई, 2021 में, जब नतीजे घोषित हुए, 88 घटनाएं और 31 मौतें दर्ज की गईं. हिंसा की ये घटनाएं बदले की भावना वाली थीं, जो तृणमूल कांग्रेस की भारी जीत के बाद विपक्षी कार्यकर्ताओं को निशाना बनाकर की गई थीं.

दोनों चरणों के मतदान भले ही खत्म हो गए हों, लेकिन लगता है चुनाव आयोग किसी तरह का जोखिम नहीं उठाना चाहता. बीते चुनावों के बाद होने वाली हिंसा की घटनाओं को देखते हुए चुनाव आयोग ने 4 मई को नतीजे आने के बाद भी केंद्रीय बलों की 700 कंपनियों को तैनात रखने का का फैसला किया है.

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