90s के वो किरदार, जिन्हें थिएटर में नहीं देखा… फिर भी Gen-Z की जुबान पर हैं इनके डायलॉग | अमर किरदार​

आज के जेन जी शायद सिंगल स्क्रीन थिएटर की लंबी कतारों, बालकनी टिकट की मारामारी और शुक्रवार को फिल्म रिलीज होने वाले उस क्रेज को महसूस न कर पाए, लेकिन एक चीज ऐसी है जो पीढ़ियों का फासला मिटा देती है और वो हैं 90 के दशक की कुछ फिल्मों के अमर किरदार। ये वो चेहरे हैं, जिनकी फिल्मों को नई पीढ़ी ने थिएटर में नहीं देखा, लेकिन उनके डायलॉग, स्टाइल और एटीट्यूड आज भी इंस्टाग्राम रील्स, मीम्स और कॉलेज कैंटीन की बातचीत में जिंदा हैं।

90s के वो किरदार, जिन्हें थिएटर में नहीं देखा… फिर भी Gen-Z की जुबान पर हैं इनके डायलॉग | अमर किरदार​

90s का सिनेमा सिर्फ फिल्में नहीं था, वो किरदारों का दौर था। उस समय हीरोहीरोइनें केवल स्टार नहीं बनते थे, बल्कि ऐसे किरदार गढ़ते थे जो लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाते थे। कुछ ने प्यार सिखाया, कुछ ने दोस्ती, कुछ ने डर, और कुछ ने जिंदगी को अपने अंदाज में जीना। चलिए अब आपको 90s के उन अमर किरदारों के बारे में बताते हैं, जो वक्त बदलने के बाद भी लोगों की जुबान से नहीं उतरे।

राज मल्होत्रा प्यार को कूल बनाने वाला लड़का

जब भी 90s के आइकॉनिक किरदारों की बात होती है, तो उसमें सबसे पहले नाम आता है शाह रुखा खान के निभाए किरदार ‘राज’ का। फिल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ का राज सिर्फ एक फिल्मी हीरो नहीं था, बल्कि उस दौर के युवाओं का सपना था। लेदर जैकेट, आंखों में शरारत, और ‘बड़े बड़े देशों में…’ जैसे डायलॉग राज ने रोमांस की परिभाषा बदल दी।

दिलचस्प बात ये है कि आज की GenZ, जिसने शायद फिल्म थिएटर में कभी नहीं देखी, वो भी ‘जा सिमरन जा…’ वाले सीन पर रील्स बनाते हैं। राज इसलिए अमर हुआ, क्योंकि उसमें हीरो वाली परफेक्शन कम और इंसानियत ज्यादा थी। वो प्यार करता था, लेकिन परिवार की इज्जत भी समझता था। यही बैलेंस उसे आज भी रिलेटेबल बनाता है।

राहुल दोस्ती और प्यार के बीच उलझा लड़का

‘प्यार दोस्ती है…’ यह एक लाइन आज भी सोशल मीडिया पर अक्सर दिखाई दे जाती है। फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ का राहुल उस दौर के हर कॉलेज बॉय की पहचान बन गया था। कूल चेन, फ्रेंडशिप बैंड, बास्केटबॉल और भावनाओं में उलझा एक लड़का, राहुल में 90s की पूरी यूथ कल्चर दिखती थी। GenZ शायद VHS कैसेट का दौर नहीं जानती, लेकिन ‘हम एक बार जीते हैं…’ वाला डायलॉग उन्हें भी याद है। यही असली स्टारडम है जब वक्त बदल जाए, लेकिन किरदार न बदले।

प्रेम मासूमियत का दूसरा नाम

90s में अगर किसी किरदार ने भारतीय परिवारों के दिलों में जगह बनाई, तो वो था ‘प्रेम’। सलमान खान ने कई फिल्मों में ‘प्रेम’ नाम रखा, लेकिन ‘हम आपके हैं कौन’ और ‘मैंने प्यार किया’ वाला प्रेम लोगों के दिलों में बस गया। प्रेम का आकर्षण उसकी सादगी में था। वो लड़कियों का सम्मान करता था, परिवार से प्यार करता था और रिश्तों को दिल से निभाता था। यही वजह है कि नई पीढ़ी भी इस किरदार से कनेक्ट करती है।

भल्लालदेव नहीं, लेकिन मोगैम्बो के बाद सबसे यादगार विलेन शाकाल

‘शान’ वैसे तो 80s की फिल्म थी, लेकिन 90s के बच्चों की यादों में ‘शाकाल’ हमेशा जिंदा रहा। कुलभूषण खरबंदा का वो लुक, खतरनाक अड्डा और क्रूर हंसी आज भी बहुत से लोगों के जहन में है। उस दौर में विलेन सिर्फ बुरे आदमी नहीं होते थे, उनकी अपनी पहचान होती थी। शायद इसी वजह से आज के विलेन सेंट्रिक मीम्स में भी शाकाल और मोगैम्बो जैसे किरदार बारबार दिखाई देते हैं।

आखिर ये किरदार अमर क्यों हैं?

90s के किरदारों की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी सच्चाई। वे सुपरहीरो नहीं लगते थे, बल्कि आम इंसानों जैसे महसूस होते थे। उनके दुख असली थे, प्यार सच्चा था, दोस्ती गहरी थी और गुस्सा भी दिल से निकलता था।

आज के दौर में कंटेंट बहुत है, लेकिन ऐसे किरदार कम हैं जो दशकों तक लोगों के दिलों में रहें। 90s के राइटर और एक्टर्स किरदारों को सिर्फ निभाते नहीं थे, उन्हें जीते थे। शायद यही वजह है कि आज के GenZ, जिसने उन फिल्मों का फर्स्ट डे फर्स्ट शो नहीं देखा, वो भी इन किरदारों के डायलॉग बोलते हैं, मीम्स बनाते हैं और रील्स रिक्रिएट करते हैं।

सिनेमा बदल गया, लेकिन किरदार नहीं भूले गए

ओटीटी का दौर आ चुका है। फिल्मों की भाषा बदल गई है। कैमरा टेक्नोलॉजी बदल गई। लेकिन जब भी नास्टैल्जिया की बात होती है, लोग फिर उसी दौर में लौट जाते हैं जहां राज ट्रेन पकड़ रहा होता है, राहुल दोस्ती समझा रहा होता है। ये किरदार सिर्फ फिल्मों के हिस्से नहीं रहे, बल्कि भारतीय पॉप कल्चर की पहचान बन गए। शायद यही किसी किरदार की सबसे बड़ी जीत होती है, जब फिल्म खत्म हो जाए, लेकिन किरदार कभी खत्म न हो।

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