स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में टोल की जंग! ईरान की वसूली पर अमेरिका का कड़ा एक्शन, जहाजों को दी चेतावनी

मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अब टकराव का केंद्र बन गया है। ईरान द्वारा जहाजों से सुरक्षित रास्ते के नाम पर वसूली किए जाने के बाद अमेरिका ने सख्त रुख अपनाते हुए शिपिंग कंपनियों को चेतावनी दी है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अगर किसी जहाज ने ईरान को भुगतान किया, तो उसे कड़े आर्थिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इस कदम से वैश्विक तेल सप्लाई और व्यापार पर बड़ा असर पड़ने की आशंका है।

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क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे व्यस्त और रणनीतिक समुद्री मार्गों में से एक है। सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक तेल और गैस व्यापार का लगभग 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने हाल के महीनों में जहाजों को अपनी तटरेखा के पास से सुरक्षित रास्ता देने के बदले शुल्क लेना शुरू किया। यह भुगतान सिर्फ नकद में ही नहीं, बल्कि डिजिटल एसेट, वस्तु विनिमय या अन्य तरीकों से भी मांगा जा रहा था। अमेरिका का कहना है कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

अमेरिका की सख्त चेतावनी

अमेरिकी विदेशी संपत्ति नियंत्रण कार्यालय ने साफ किया है कि कोई भी कंपनी या व्यक्ति अगर ईरान को इस तरह का भुगतान करता है, तो वह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकता है। यह चेतावनी सिर्फ अमेरिकी कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर की शिपिंग कंपनियों पर लागू होगी। स्थिति को और गंभीर बनाते हुए अमेरिका ने 13 अप्रैल को ईरान के खिलाफ नौसैनिक नाकाबंदी लागू कर दी। इसके तहत ईरानी तेल टैंकरों को समुद्र में आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक, अब तक दर्जनों जहाजों को वापस लौटने के लिए कहा जा चुका है।

वैश्विक बाजार पर असर

एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस टकराव का सीधा असर तेल की कीमतों और सप्लाई चेन पर पड़ेगा। अगर होर्मुज में तनाव जारी रहा, तो कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिससे महंगाई बढ़ने का खतरा भी है। फिलहाल हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। ईरान और अमेरिका दोनों ही अपनेअपने रुख पर अड़े हैं। ऐसे में यह टकराव कब तक चलेगा और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ेगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।

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