भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्लास्टिक करेंसी पर विचार किए जाने की खबर के बाद देशभर में इसकी चर्चा तेज हो गई है. RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को इसकी जानकारी दी है. उन्होंने बताया कि पॉलिमर नोट का प्रस्ताव अभी शुरुआती चरण में है और इस पर आगे विचार किया जा रहा है. हालांकि, रिपोर्ट्स की मानें तो इस संबंध में जल्द ही एक पायलट प्रोजेक्ट की घोषणा की जा सकती है. शुरुआती दौर में 10 रुपये और 20 रुपये के नोट चुने जा सकते हैं, क्योंकि ये सबसे ज्यादा इस्तेमाल होते हैं और जल्दी खराब हो जाते हैं.

दुनिया के करीब 60 देशों में पहले से ही प्लास्टिक करेंसी चलन में है. इनमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देश शामिल हैं.
ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले हुई शुरुआत
प्लास्टिक नोटों की शुरुआत सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने की थी. ऑस्ट्रेलिया ने 1988 में पॉलीमर आधारित नोट जारी किए थे. इन नोटों को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और नकली नोटों के खिलाफ प्रभावी माना गया. ऑस्ट्रेलिया की प्लास्टिक करेंसी को दुनिया की सबसे मजबूत करेंसी में गिना जाता है, जिसकी उम्र कई वर्षों तक हो सकती है.
इसके बाद धीरेधीरे अन्य देशों ने भी इस तकनीक को अपनाया. कनाडा ने 2011 में अपने बैंक नोटों को पॉलीमर आधारित बना दिया, जबकि यूरोप के कई देशों ने भी समयसमय पर इस दिशा में कदम उठाए.
प्लास्टिक नोटों के क्या हैं फायदे?
विशेषज्ञों के अनुसार प्लास्टिक नोट कागज के नोटों की तुलना में कई मामलों में बेहतर होते हैं. सबसे बड़ा फायदा उनकी लंबी उम्र है. जहां सामान्य कागजी नोट 2 से 3 साल में खराब हो सकते हैं, वहीं प्लास्टिक नोट 5 से 10 साल या उससे अधिक समय तक चल सकते हैं.
इसके अलावा ये नोट पानी, नमी और धूल से कम प्रभावित होते हैं. बारबार इस्तेमाल के बावजूद इनके फटने या खराब होने की संभावना कम रहती है. इससे नए नोट छापने की जरूरत भी कम पड़ती है.
नकली नोटों पर लग सकती है रोक
RBI की हालिया रिपोर्ट में ₹500 के नकली नोटों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई गई है. ऐसे में प्लास्टिक नोट सुरक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं. पॉलीमर नोटों में विशेष सुरक्षा फीचर जोड़ना आसान होता है, जिससे उनकी नकल करना काफी मुश्किल हो जाता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि प्लास्टिक करेंसी लागू होने से फेक करेंसी के कारोबार पर बड़ी चोट पड़ सकती है और नकदी प्रणाली अधिक सुरक्षित बन सकती है.
नोट छपाई की लागत भी होगी कम
भारत में हर साल नोटों की छपाई और उनके रखरखाव पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं. खराब नोटों को वापस लेना, नष्ट करना और नए नोट छापना एक महंगी प्रक्रिया है. प्लास्टिक नोटों की लंबी उम्र के कारण यह खर्च काफी हद तक कम हो सकता है.
वित्त वर्ष 202425 में बड़ी संख्या में खराब नोटों को चलन से बाहर करना पड़ा था. ऐसे में प्लास्टिक नोट RBI के लिए लागत बचत का भी बड़ा माध्यम बन सकते हैं.
घबराने की जरूरत नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में भारत में प्लास्टिक नोट लागू किए जाते हैं तो यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से होगी. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। कागजी नोटों को अचानक बंद नहीं किया जाएगा. दोनों प्रकार की करेंसी कुछ समय तक साथसाथ चल सकती हैं. फिलहाल RBI केवल इस विकल्प पर विचार कर रहा है. लेकिन अगर यह योजना आगे बढ़ती है तो भारत की मुद्रा व्यवस्था में एक बड़ा तकनीकी बदलाव देखने को मिल सकता है, जैसा दुनिया के कई विकसित देशों में पहले से हो चुका है.





