चुनावी दंगल से पहले कांग्रेस की नई जोर-आजमाइश, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ को धार देने की तैयारी​

अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर देश में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं. इस चुनावी महामुकाबले में खुद को मुख्य विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए कांग्रेस ने एक नई और रणनीतिक सोशल इंजीनियरिंग पर काम करना शुरू कर दिया है. पार्टी अपने दो सबसे पारंपरिक और मजबूत स्तंभों दलित और अल्पसंख्यक समाज को एक साझा मंच पर लाने की बड़ी तैयारी लगी हुई है. इसके लिए कांग्रेस के अनुसूचित जाति और अल्पसंख्यक विभागों ने आपस में हाथ मिलाया है.

चुनावी दंगल से पहले कांग्रेस की नई जोर-आजमाइश, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ को धार देने की तैयारी​

कांग्रेस का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था और सत्ताधारी दल के शासनकाल में इन दोनों ही समुदायों को सबसे ज्यादा हाशिए पर धकेला गया है. पार्टी नेताओं के अनुसार, जहां एक वर्ग को जाति के नाम पर प्रताड़ना और भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरे वर्ग को धर्म के नाम पर निशाना बनाया जा रहा है. रोजगार और शिक्षा जैसे बुनियादी क्षेत्रों में भी इन दोनों समुदायों को अवसरों से वंचित रखने के आरोप लगाए जा रहे हैं.

यही कारण है कि कांग्रेस इन दोनों वर्गों के बीच केवल राजनीतिक तालमेल ही नहीं, बल्कि एक वैचारिक जुड़ाव भी बनाना चाहती है. इस अभियान की शुरुआत राजधानी दिल्ली में होने वाले एक बड़े साझा सम्मेलन से होगी. इस आयोजन में केवल पार्टी के नेता ही शामिल नहीं होंगे, बल्कि समाज के प्रबुद्ध नागरिक, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और कलाकार भी जुटेंगे, ताकि दोनों समुदायों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को सुधारने का एक ठोस ‘रोडमैप’ तैयार किया जा सके.

दिल्ली में महासम्मेलन: रणनीति की शुरुआत

इस बड़े अभियान की आधिकारिक शुरुआ तकल 6 जून को देश की राजधानी दिल्ली में होने वाले एक भव्य संयुक्त सम्मेलन से होने जा रही है. पार्टी नेताओं के अनुसार, इस मंच पर न सिर्फ दोनों विभागों के प्रमुख नेता और कार्यकर्ता जुटेंगे, बल्कि इसमें नागरिक समाज के सदस्य, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रबुद्ध बुद्धिजीवी और कलाकार भी हिस्सा लेंगे. इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य दोनों समुदायों की बुनियादी समस्याओं पर गहराई से मंथन करना और उनके अधिकारों व आर्थिक सुधार के लिए एक ठोस नीति तैयार करना है. 6 जून को इसका रोड मैप तैयार होगा.

सूत्रों का दावा है कि, रोडमैप पर शीर्ष नेतृत्व से चर्चा करके इसके सम्मेलन देश के उन सभी राज्यों में आयोजित किए जाएंगे जहां चुनाव होने वाले हैं, जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर.

चुनावी गणित और राहुल का स्पष्ट संदेश

इस पूरी कवायद के पीछे गहरा चुनावी अंकगणित भी छिपा है. चुनावी राज्यों में दलित और अल्पसंख्यक आबादी मिलकर करीब 35 से 40 फीसदी का एक बड़ा हिस्सा बनाती है. कांग्रेस के रणनीतिकारों को भरोसा है कि यदि इस संयुक्त वोट बैंक को पूरी तरह साध लिया गया, तो सत्ता की राह बेहद आसान हो जाएगी. भविष्य में दलितमुस्लिम के साथ अति पिछड़ा को जोड़ा जाएगा, उसके बाद पिछड़े वर्ग को इसका हिस्सा बनाया जाएगा. फिर अंत में गरीब सवर्णों को भी इससे जोड़ा जाएगा.

2029 से पहले UPपंजाब का समीकरण

उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ने के बाद दलित मतदाता एक मजबूत विकल्प की तलाश में हैं. कांग्रेस को उम्मीद है कि वह इस खाली जगह को भर सकती है. इसी तरह पंजाब में भी वो इसके जरिए दलितों को लुभाएगी.

‘संविधान बचाओ’ अभियान का असर

साल 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा चलाए गए ‘संविधान बचाओ’ अभियान को दलित समाज से भारी समर्थन मिला था, जिसका सीधा फायदा उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की सीटों में बढ़ोतरी के रूप में दिखा था. कांग्रेस इसी गति को आगे भी बनाए रखना चाहती है.

पार्टी के भीतर भी नेतृत्व का रुख अब बेहद मुखर नजर आ रहा है. राहुल गांधी ने अल्पसंख्यक नेताओं के साथ हुई बैठकों में साफ तौर पर कहा है कि यदि मुस्लिम या किसी अन्य अल्पसंख्यक समाज के साथ अन्याय होता है, तो नेताओं को ‘अल्पसंख्यक’ जैसे व्यापक शब्दों के पीछे छिपने की जगह सीधे और स्पष्ट रूप से उनके मुद्दों को उठाना चाहिए.

ध्रुवीकरण बनाम आर्थिक चुनौतियां

कांग्रेस का यह भी आकलन है कि बीजेपी और आरएसएस द्वारा खड़ा किया जाने वाला हिंदूमुस्लिम ध्रुवीकरण का नैरेटिव आने वाले समय में कमजोर पड़ेगा. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि जैसेजैसे देश में महंगाई और बेरोजगारी जैसी आर्थिक मुश्किलें बढ़ेंगी, आम जनता का ध्यान नफरत की राजनीति से हटकर वास्तविक बुनियादी मुद्दों पर केंद्रित होगा. क्षेत्रीय दलों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए कांग्रेस खुद को भाजपा के सामने एकमात्र मजबूत राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश कर रही है.

कांग्रेस का यह नया अभियान केवल एक चुनावी गठबंधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और अधिकारों की बात कर के अपने पुराने जनाधार को वापस पाने की एक बड़ी राजनीतिक कोशिश है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। देखना यह होगा कि दिल्ली से शुरू होने वाली यह सोशल इंजीनियरिंग चुनावी राज्यों की जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है.

Leave a Reply