European Union History Part 3 | Brexit के बाद अब क्या टूटेगा EU |Teh Tak

दुनिया में कभी आपसी एकता, खुली सीमाओं और मजबूत अर्थव्यवस्था की मिसाल माना जाने वाला यूरोपियन यूनियन आज एक बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है। हालात ऐसे हैं कि अर्थव्यवस्था से लेकर राजनीति तक, ईयू चौतरफा घिर चुका है। अमेरिका और चीन के मुकाबले यूरोप अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई तकनीकों और आर्थिक विकास में काफी पिछड़ रहा है। वहां लगातार बढ़ती महंगाई और सुस्त विकास दर ने आम जनता की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। इसके अलावा, पर्यावरण को बचाने के लिए EU ने ‘ग्रीन ट्रांजिशन’ के नाम पर जो सख्त नियम बनाए हैं, उनसे खेती और जनजीवन इतना महंगा हो गया है कि पूरे यूरोप में किसान सड़कों पर उतर कर विरोध कर रहे हैं। वहीं, रूसयूक्रेन युद्ध के लंबा खिंचने से यूरोप का खजाना खाली हो रहा है और अब खुद सदस्य देशों के बीच इस बात पर मतभेद गहराने लगे हैं कि यूक्रेन को और कितनी आर्थिक और सैन्य मदद दी जाए।
इन आर्थिक और बाहरी चुनौतियों के बीच, यूरोप की राजनीति में भी एक बड़ा भूचाल आ गया है। फ्रांस, जर्मनी, इटली और नीदरलैंड्स जैसे देशों में दक्षिणपंथी यानी राष्ट्रवादी और प्रवासी विरोधी पार्टियां तेजी से हावी हो रही हैं, जो सीधे तौर पर ईयू के सिस्टम और उसकी एकता को चुनौती दे रही हैं।

European Union History Part 3 | Brexit के बाद अब क्या टूटेगा EU |Teh Tak
लेकिन, यूरोप की इस राजनीतिक और सामाजिक उथलपुथल की शुरुआत अचानक नहीं हुई है। विशेषज्ञों की मानें तो इसकी सबसे गहरी जड़ें 2015 के ‘सीरियाई शरणार्थी संकट’ में छिपी हैं। ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। आइए समझते हैं कि सीरिया ने यूरोप को हमेशा के लिए कैसे बदल दिया। 201516 के दौरान सीरियाई गृहयुद्ध के कारण करीब 10 लाख से ज्यादा लोग जान बचाकर अचानक यूरोप की सीमाओं पर पहुंच गए। यूरोप का पूरा सिस्टम इतने बड़े शरणार्थी संकट को एक साथ संभालने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। जब इन शरणार्थियों को 27 देशों के बीच ‘कोटा सिस्टम’ से बांटने की बात आई, तो देशों के बीच भारी विवाद शुरू हो गया। कई देशों ने अपनी सीमाएं सील कर दीं। इससे बिना पासपोर्ट पूरे यूरोप में घूमने की आज़ादी देने वाला मशहूर ‘शेंगेन एग्रीमेंट’ ही खटाई में पड़ गया। प्रवासियों के अचानक आने से जो डर का माहौल बना, उसका सीधा फायदा दक्षिणपंथी नेताओं को मिला। उन्होंने इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’, ‘संस्कृति’ और ‘नौकरियों’ पर खतरा बताकर वोट बटोरे। आज यही पार्टियां सत्ता की चाबी बन गई हैं और इन्होंने यूरोप की मुख्यधारा की राजनीति को पूरी तरह पलट दिया है। आपको याद होगा कि ब्रिटेन ने ईयू छोड़ दिया था। इस ‘ब्रेग्जिट’ के पीछे भी सबसे बड़ा कार्ड प्रवासियों का डर ही था। वहां के नेताओं ने सीरियाई संकट का हवाला देकर ही जनता से EU छोड़ने के पक्ष में वोट करवाया था। जो लिबरल पार्टियां पहले मानवाधिकारों की बात करते हुए शरणार्थियों का स्वागत कर रही थीं, उन्हें भी चुनाव जीतने और जनता का गुस्सा शांत करने के लिए अपने नियम कड़े करने पड़े। आज यूरोप की सीमाएं पहले से कहीं ज्यादा सख्त हैं।

कुल मिलाकर कहें तो, 2015 के सीरिया संकट ने यूरोपियन यूनियन की उस ‘एकता’ और ‘उदारवाद’ वाली छवि को तोड़ दिया, जिस पर वह खड़ा था। उसी दरार से आज की राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई है। अब देखना यह होगा कि क्या EU इस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाता है, या फिर आपसी मतभेदों में और उलझता चला जाएगा। संक्षेप में कहें तो, 2015 के सीरियन संकट ने यूरोपियन यूनियन की उस ‘एकता’ और ‘उदारवाद’ की नींव हिला दी, जिस पर वह खड़ा था। उसी दरार से जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई, वह आज यूरोप की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है।

 

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