भारत सरकार ने पेट्रोल में 30 फीसदी तक इथेनॉल बढ़ाने का ऐलान किया है. इस ऐलान का सीधा सा मकसद कच्चे तेल के आयात को कम करना है. देश में E20 के बाद E30 के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाएगा. E30 का मतलब है कि ईंधन में 30 फीसदी इथेनॉल और 70% पेट्रोल मिला हुआ है. भारत में E20 फ्यूल का इस्तेमाल किया जा रहा है. अब सरकार ने इसे बढ़ाकर 30 फीसदी तक इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल के मानक जारी कर दिए गए हैं.

यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं और दुनियाभर में तेल की आपूर्ति का संकट बढ़ गया है. इथेनॉल एक बायोफ्यूल है जिसे गन्ने की मदद से तैयार किया जाता है.
गन्ने से कैसे बनता है इथेनॉल?
भारत में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है. उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्य गन्ने की खेती में अव्वल हैं. गन्ना अब सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं रहा. इससे भारत में इथेनॉल भी बनाया जा रहा है. पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर ईधन की खपत कम की जा रही है और किसानों की आय भी बढ़ाई जा रही है.
उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्य गन्ने की खेती में अव्वल हैं.
पेट्रोल में 10% से 20% तक इथेनॉल मिलाने से न केवल उत्सर्जन कम होता है, बल्कि विदेशी कच्चे तेल पर निर्भरता भी घटती है. यह केंद्र सरकार की इथेनॉल सम्मिश्रण नीति है. यही वजह है कि सरकार इसे बढ़ावा दे रही है. अब यह भी जान लेते हैं कि गन्ने से कैसे इथेनॉल बनता है.
1 गन्ने का रस
गन्ने से इथेनॉल बनाने के लिए सबसे पहले गन्ने का चुनाव किया जाता है. बड़े स्तर पर मशीनों के जरिए गन्ने का रस निकाला जाता है. इसके लिए गन्ने को चीनी मिल में क्रशर से गुजारा जाता है. इस प्रक्रिया में गन्ने को कई बार दबाया जाता है और उसमें से रस निकाला जाता है. इस रस में सुक्रोज , ग्लूकोज और फ्रक्टोज होते हैं. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। इसका बचा हुआ ठोस हिस्सा ‘बगास’ कहलाता है, जिसे बॉयलर में जलाकर बिजली बनाई जाती है.
2 रस की सफाई और फर्मेंटेशन
मशीनों से निकाले गए रस में अशुद्धियां होती हैं. इसे हटाने के लिए चूने के पानी को मिलाया जाता है और गर्म करते हैं. इससे अशुद्धियां जम जाती हैं और रस साफ होता है. इसे क्लेरिफाइड जूस कहते हैं. यही प्रक्रिया इथेनॉल को बनाने का प्रमुख चरण है.साफ किए गए रस को बड़ेबड़े फर्मेंटेशन टैंक में डाला जाता है. इसमें यीस्ट मिलाया जाता है. यीस्ट शर्करा को दो हिस्सों में बदलता है. इथेनॉल और कार्बनडाईऑक्साइड. यह प्रक्रिया 24 से 72 घंटे तक चलती है. तापमान को 28 से 32 डिग्री सेल्सियस तक रखा जाता है. फर्मेंटेशन के बाद तैयार तरल पदार्थ को वॉश कहते हैं. इसमें 8 से 12 फीसदी तक इथेनॉल होता है.
वॉश में इथेनॉल की मात्रा कम होती है. इसे शुद्ध करने के लिए वॉश को आसवन स्तंभों में गर्म किया जाता है. यह वाष्पित होता है. वाष्प को ठंडा करके तरल इथेनॉल प्राप्त किया जाता है. इस प्रक्रिया से तैयार इथेनॉल लगभग 95% होता है.
3 डिहाइड्रेशन की प्रॉसेस
95% इथेनॉल में अभी भी 5% पानी है. इसे पेट्रोल मिलाने के लिए इथेनॉल को 99 फीसदी तक शुद्ध करना पड़ता है. 99% फीसदी तक इथेनॉल में पानी को घटाने के लिए इथेनॉल मॉलिक्यूलर छलनी का उपयोग किया जाता है. इस चरण के बाद जो इथेनॉल मिलता है वह ‘फ्यूल ग्रेड इथेनॉल’ कहलाता है. यह 99 फीसदी प्योर इथेनॉल होता है.





