वैश्विक स्तर पर छाई अनिश्चितता, 28 फरवरी से शुरू हुए ईरान युद्ध और अप्रैलमई में बढ़ी महंगाई के बावजूद भारतीय उपभोक्ता जमकर खरीदारी कर रहे हैं. रोजमर्रा के जरूरी सामान से लेकर ब्यूटी और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स तक की मांग में कोई कमी नहीं आई है. दिग्गज एफएमसीजी कंपनियों के टॉप अधिकारियों का कहना है कि सप्लाई चेन में आई रुकावटों के बावजूद घरेलू खपत मजबूत बनी हुई है. हालांकि, आने वाले दो से तीन तिमाहियों के लिए बाजार के जानकारों ने थोड़ी सावधानी बरतने की सलाह दी है, क्योंकि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का दबाव आगे चलकर अपना असर दिखा सकता है.

कंपनियों की उम्मीदें बरकरार
मार्च 2026 को खत्म हुई तिमाही में हिंदुस्तान यूनिलीवर , आईटीसी, नेस्ले, मैरिको तथा गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स जैसी बड़ी कंपनियों के नतीजे मिलेजुले रहे हैं. पिछले साल जीएसटी दरों में हुई कटौती व प्रीमियम उत्पादों की बढ़ती मांग ने कंपनियों को काफी राहत दी है. नेस्ले इंडिया के चेयरमैन मनीष तिवारी का स्पष्ट कहना है कि पश्चिम एशिया का भूराजनीतिक तनाव व कमोडिटी की बढ़ती कीमतें उद्योग के नियंत्रण से बाहर हैं, लेकिन उच्च आय वर्ग के उपभोक्ताओं की तरफ से मांग अभी भी काफी मजबूत है. इसी तरह नायका की मूल कंपनी एफएसएन ईकॉमर्स वेंचर्स की एमडी फाल्गुनी नायर के मुताबिक, उनके उत्पाद ‘छोटी विलासिता’ की श्रेणी में आते हैं, जिनकी खपत मुश्किल समय में भी आसानी से कम नहीं होती.
डेयरी उत्पादों में जबर्दस्त उछाल
खानेपीने की चीजों की बात करें तो बाजार में जबरदस्त तेजी देखने को मिल रही है. मदर डेयरी व राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के चेयरमैन मीनेश शाह ने इस ट्रेंड की पुष्टि करते हुए बताया कि खपत के पैटर्न में कोई खास गिरावट नहीं आई है. भारत इस वक्त ऐसे मुकाम पर है जहां चीज, दही या आइसक्रीम जैसे उत्पादों में 25 प्रतिशत से ज्यादा की ग्रोथ देखी जा रही है. ये खबर आप गज़ब वायरल में पढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि अगर महंगाई का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर केवल चुनिंदा आय वर्ग के लोगों पर ही पड़ने की आशंका है.
उत्पादन लागत बढ़ने से पैकेट का वजन घटा
ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट व कच्चे माल की लागत काफी बढ़ गई है. इसका सीधा असर पैक्ड फूड बनाने वाली कंपनियों पर पड़ा है. इस बढ़ती लागत से निपटने के लिए ज्यादातर कंपनियों ने या तो उत्पादों की कीमतें 3 से 8 प्रतिशत तक बढ़ा दी हैं या फिर उसी कीमत में पैकेट का वजन कम कर दिया है. जायडस वेलनेस के सीईओ तरुण अरोड़ा का कहना है कि भारत की खपत की कहानी के बुनियादी आधार मजबूत हैं. अगर तनाव अगले कुछ तिमाहियों तक जारी रहता है, तो लागत मुद्रास्फीति एक बड़ी चिंता होगी. फिलहाल कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को बेहतर बनाकर कीमतों को संतुलित करने की कोशिश कर रही हैं. सफोला तेल बनाने वाली कंपनी मैरिको के एमडी सौगत गुप्ता का भी यही मानना है कि अभी स्थिति ‘वेट एंड वॉच’ वाली है, लेकिन सकारात्मक बने रहने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं.
आगे कैसा रहेगा बाजार का मिजाज
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के संगठित एफएमसीजी सेक्टर का राजस्व इस वित्त वर्ष में 810 प्रतिशत की दर से बढ़ सकता है, जो पिछले वित्त वर्ष में 8 प्रतिशत था. कीमतों में हुए इजाफे से यह रेवेन्यू ग्रोथ देखने को मिलेगी. हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण कंपनियों के मुनाफे पर दबाव जरूर पड़ेगा. फाल्गुनी नायर ने भी आगाह किया है कि विदेशी मुद्रा दरों में उतारचढ़ाव व तेल की कीमतें अगले साल के लिए सतर्क रहने का संकेत दे रही हैं. खराब मानसून, कमजोर घरेलू खपत व लंबे समय तक तेल की ऊंची कीमतें इस पूरे सेक्टर के लिए मुख्य जोखिम बने हुए हैं.





